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खाने की तलाश में भटकते भटकते बीतता है खानाबदोशों का जीवन

 


खानाबदोश मानवसमाज समुदाय का अपने रहने के लिए कोई निश्चित स्थान नहीं है। यह लगातार बदलता रहता है। साधारण रूप से खानाबदोश कबीलों और जातियों का अपना क्षेत्र होता है, जिसमें वे आवश्यकतानुसार घूमते फिरते रहते हैं। आम तौर पर उनका स्थान परिवर्तन भोजन की उपलब्धि पर निर्भर करता है। शिकारी खानाबदोश आखेट की खोज में निरंतर घूमते रहते हैं, परंतु पशुपालक खानाबदोश मौसम के अनुसार अपने पशुदलों को लेकर घास और चरागाह की खोज में घूमते रहते हैं।

उद्विकासवादी मानव वैज्ञानिकों का विचार है कि अपनी प्रारंभिक सांस्कृतिक अवस्था में मनुष्य खानाबदोश रहा होगा। यह दशा आखेट युग और पशुपालन युग तक रही होगी। कृषि की जानकारी के साथ मनुष्य ने स्थायी जीवन सीखा। कुछ कबीले जो अभी भी शिकारी या पशुपालक हैं, खानाबदोश जीवन व्यतीत करते हैं।

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शिकारी खानाबदोश

शिकारी खानाबदोश का सामाजिक जीवन अधिकतर छोटे छोटे पारिवारिक समूहों में संगठित होता है। इसका कारण यह है कि जंगलों में इतना शिकार या कंद-मूल-फल नहीं मिल पाते जिससे कि बड़े समुदाय का भरण पोषण हो सके। मध्य प्रदेश स्थित सरगुजा के पहाड़ी कोरवा, 25-30 व्यक्तियों के छोटे छोटे समुदायों में रहते हैं और ऐसा प्रत्येक समुदाय का पाँच छह वर्गमील जंगल पर अधिकार रहता है। कोचीन के कादार, लंका के बेद्दा, उत्तरी ध्रुव के एस्कीमो, मध्य आस्ट्रेलिया के अरूंटा, अफ्रीका के बुशमैन और ब्राजील के जंगली आदिवासी सभी छोटे छोटे दलों में संगठित हैं।

पशुपालक खानाबदोश

पशुपालक खानाबदोश दल का आकार बहुत बड़ा होता है। अरब के बद्दू, मध्य एशिया के खिरगिज और मंगोल, उत्तरी अमेरिका के एलगोफिन, अफ्रीका के नुरम और मसाई, ये सभी खानाबदोश सैकड़ों की संख्या में दल बनाकर रहते हैं और दल में ही घूमते हैं। ये अपने पालतू पशु ऊँट, खच्चर, घोड़ा, गाय-बैल या भैंसे लिए चरागाह और पानी की तलाश में घूमते है और किसी भी स्थान पर एक मौसम से अधिक नहीं टिकते हैं। इसलिए इनका जीवन अभी प्रकार के मौसमी परिवर्तन के अनुकूल हो जाता है। 

पशु इनका मुख्य धन है। पशुओं की देखभाल पुरूष करते हैं, स्त्रियाँ गृह कार्य संभालती हैं और बागवानी करती हैं। इन समुदायों में स्त्रियों का स्थान नीचा समझा जाता है। शिकारी खानाबदोशों की भाँति ही इनका राजनीतिक जीवन गणतांत्रिक होता है, परंतु उनमें बड़े बूढ़ों को विशेष मान्यता प्राप्त होती है।

भारत में हैं अनेक खानाबदोश कबीले और जातियाँ

भारत में ऐसे ही अनेक खानाबदोश कबीले और जातियाँ हैं। इनमें से कई अपराधोपजीवी हैं, जो चोरी और ठगी जैसे अपराधों द्वारा जीवनयापन करते हैं। आसानी से धन प्राप्त करने के अवसर की खोज में और पुलिस के भय से ये लोग खानाबदोश रहे हैं। ऐसी जातियों में मुख्य हबूड़ा, कंजर, भाँट, संसिया, नट, बागड़ी यनादि, कालबेलिया आदि हैं। कुछ अन्य जातियाँ हैं, जो पशुपालक हैं या दस्तकारी का काम करती हैं, जैसे उत्तरी-पश्चिमी भारत में गूजर या राजस्थान में गाडूड़िया लोहार।

अनेक पशुपालक खानाबदोशों ने दुर्दम सैनिक संगठन बनाए हैं। इतिहास प्रसिद्ध मंगोल, गोल्डेन होर्ड, मंचू और तुर्क खानाबदोश ही थे, जिन्होंने मध्ययुग में एशिया और यूरोप में विस्तृत साम्राज्यों की स्थापना की। अफ्रीका के जूलू और मसाई भी इन्हीं के उदाहरण हैं।


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