
प्राचीन काल से ही भारत की लोक कला एवं लोक संस्कृति को संजोए रखने में विमुक्त घुमंतू व अद्र्ध घुमंतू जनजातियों की अहम भूमिका रही है। इसके बावजूद आजादी के 74 सालों बाद भी हमारे देश तथा समाज का ध्यान इन जनजातियों की तरफ नहीं गया है, जबकि हम सभी इस बात से भली भांति वाकिफ हैं कि इन्हीं लोगों के क्रांतिकारी सहयोग की वजह से हम आजाद भारत का हिस्सा बने हैं।
यह हमारे देश की विडंबना है कि इन जनजातियों की कुल आबादी का 10 प्रतिशत हिस्सा भी हमारे समाज की मुख्य धारा से नहीं जुड़ पाया है तथा सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और राजनीतिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है। भारत की विमुक्त घुमंतू एवं अद्र्ध घुमंतू जनजातियों में करीब 840 जातियां शामिल हैं। देश की आजादी के बाद से अब तक इन समुदायों के लिए महज 8 आयोग बने हैं, जिन्होंने प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से घुमंतू जनजातियों को पिछड़ेपन की सूची में शामिल करने एवं सुरक्षित आरक्षण की सिफारिश की है, परंतु इस समुदाय की राजनीतिक भागीदारी नगण्य होने के कारण किसी भी आयोग की रिपोर्ट को संसद में पेश नहीं किया गया। घुमन्तु समुदाय के लिए यूपीए सरकार द्वारा गठित बालकृष्ण रेनके आयोग व एनडीए सरकार द्वारा गठित दादा इदाते आयोग की रिपोर्ट अभी तक ससंद में पेश नहीं की गई है।
दरअसल संसद के मानसून सत्र में ‘बालकृष्ण रेनके आयोग’ और ‘दादा इदाते आयोग’ की रिपोर्ट लागू करने के संबंध में पूर्व राज्यमंत्री गोपाल केसावत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम जयपुर जिला कलेक्टर डॉ. जोगाराम को ज्ञापन सौंपा था।

इस ज्ञापन के अंतर्गत यह मांग की गई थी कि बालकृष्ण रेनके आयोग व दादा इदाते आयोग की रिपोर्ट को संयुक्त रूप से मानसून सत्र में संसद में रखकर लागू किया जाए। सरकारी नौकरियों में विमुक्त, घुमंतू तथा अर्द्ध घुमंतु जनजातियों के लिए 10 फीसदी आरक्षण सुरक्षित किया जाए। वैश्विक महामारी कोरोना वायरस से तबाह हुई घुमंतू और अर्द्ध घुमंतु जनजातियों के लिए एक हजार करोड़ के विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा की जाए। साथ ही विमुक्त घुमंतू एवं अर्द्ध घुमंतू जनजाति भारत में सर्वाधिक रूप से पिछड़े व वंचित हैं। इसलिए स्थाई आयोग का गठन करना चाहिए और आयोग में विमुक्त घुमंतू एवं अर्द्ध घुमंतू से संबंधित जातियों के व्यक्तियों की ही नियुक्ति होनी चाहिए।
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