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सदियों से देश की लोकप्रियता बढ़ाता बंजारा समुदाय

 


प्राचीन समय से ही भारत देश की लोकप्रियता को लेकर बंजारा समाज की अनोखी भूमिका रही है। बंजारा शब्द मात्र अपने आप में एक पूरी जीवन शैली और संस्कृति समेटे हुए है। बंजारा शब्द सुनते ही घुमक्कड़, रंग-बिरंगे चमकीले कपड़े और चांदी के बड़े और भारी गहने पहने वाले व्यक्तियों की छवि मस्तिष्क में उभरती है। इस समुदाय के लोग छोटी-मोटी चीजों का व्यापार करके अपना जीवन यापन करते हैं। हम जो कांच, कौढ़ियों तथा चीनी के बने बहुरंगी मनकों को देखकर इन आभूषणों के प्रति आकर्षक हो जाते हैं, सब इन बंजारों की ही देन है। भारत ही नहीं समूचे विश्व में इन आभूषणों को पसंद किया जाता है। इस प्रकार समस्त विश्व व्यापार में बंजारा समुदाय का सालों से महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

अनेक नामों से प्रसिद्द हैं बंजारे

सुदूर बीहड़ एवं दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के जीवन में इनकी महत्ता और भी अधिक है। आदिवासी समुदाय के जिस प्रचलन को देखकर हम आश्चर्य चकित होते हैं, वे वस्तुऐं बंजारों तथा घुमन्तु व्यापारियों द्वारा ही आदिवासियों तक पहुँचती हैं। छत्तीसगढ़ में बंजारों की उपस्थिति अथवा यहाँ के समाजिक जीवन में उनकी अतुल्य भूमिका के उल्लेख यहाँ के प्रचलित मध्ययुगीन कथाओं तथा कहानियों में मिलते हैं। यहाँ की लोकप्रिय गाथा चंदा-लोरिक अथवा चंदैनी में एक चरित्र बंजारे का भी है, जिसे नायक कहा गया है। साथ ही बस्तर के माड़िया आदिवासी इन्हें लमान-लमानिन कहते हैं। लमान जाति की महिलाएँ शरीर पर गोदना गोदने का व्यवसाय करती हैं। इसके अलावा लम्बे समय से कोढ़ी, काँच और हाथी दाँत की विभिन्न श्रृंगारिक वस्तुएं बनाकर बेचना भी इनका प्रमुख व्यवसाय रहा है। कोंडागांव क्षेत्र में बंजारों को बैपारी कहा जाता है। इसका कारण यह है कि पहले ये ही लोग आन्ध्र प्रदेश के सालूर से बैलों या गधों की पीठ पर नमक लाद कर लाते थे और बस्तर के आदिवासियों को नमक की आपूर्ति करते थे। 

छत्तीसगढ़ की शान हैं बंजारे 

यूँ तो बंजारे समूचे छत्तीसगढ़ में फैले हुए हैं, परन्तु बस्तर में इनकी बहुत बड़ी जनसंख्या है। यहाँ का कोई भी मढ़ई-मेला और हाट बाजार इन बंजारों की बहुरंगी दुकानों के बिना असंभव सा है। वास्तव में बस्तर की रंगभरी आदिवासी संस्कृति में बंजारों की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। आज गौरसींघ और कौढ़ियों से सुसज्जित शिरस्त्राण (एक प्रकार की टोपी) पहने माड़िया पुरुष बस्तर और छत्तीसगढ़ की पहचान बन गए हैं। बंजारा समुदाय की महिलाएं सदियों से शिरस्त्राण बना रही हैं।

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