'फिनांशियल इम्यूनिटी' के लिए 'बीमा' - एसबीआई लाइफ की फिनांशियल इम्यूनिटी स्टडी 3.0
देश के 71% गैर-बीमाकृत लोगों को लगता है कि 'फिनांशियल इम्यूनिटी' के लिए 'बीमा' महत्वपूर्ण ज़रिया है - एसबीआई लाइफ की फिनांशियल इम्यूनिटी स्टडी 3.0 का निष्कर्ष
पिछले पांच साल में लगभग आधे (47%) बीमित व्यक्तियों ने अपनी बीमा पॉलिसी सरेंडर कर दी
मुख्य निष्कर्ष:
- उपभोक्ताओं की मुख्य चिंता, चिकित्सा खर्चों से हटकर मुद्रास्फीति और जीवन यापन की बढ़ती लागत पर केंद्रित हो गई है
- हालांकि 80% उपभोक्ताओं का मानना है कि वित्तीय सुरक्षा के लिए बीमा महत्वपूर्ण ज़रिया है, 94% के पास या तो बीमा नहीं था या पर्याप्त कवर नहीं था।
- 37% उपभोक्ता फिनांशियल इम्यूनिटी (वित्तीय प्रतिरक्षा) की तुलना 'आय के कई स्रोत होने' से करते हैं, और 41% का दावा है कि 'आय के दूसरे स्रोत' होने से फिनांशियल इम्यूनिटी बढ़ सकती है।
- 52% भारतीय परिवारों का ध्यान फिनांशियल इम्यूनिटी पर केंद्रित आय आवंटन बचत, निवेश, जीवन बीमा और स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में धन निवेश करके वित्तीय प्रतिरक्षा के निर्माण पर केंद्रित है।
- 80% उपभोक्ता पूरी तरह से नियोक्ता द्वारा दी गई बीमा पॉलिसियों पर निर्भर हैं
देश के सबसे भरोसेमंद निजी जीवन बीमाकर्ताओं में से एक, एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस ने अपना व्यापक उपभोक्ता अध्ययन - 'फाइनांशियल इम्युनिटी स्टडी (एफ.आई.) 3.0' (वित्तीय प्रतिरक्षा अध्ययन 3.0) का तीसरे संस्करण पेश किया, जिसका शीर्षक है "उपभोक्ताओं के भ्रम का खुलासा" (डीमिस्टीफायिंग द कन्ज़्यूमर्स इल्यूज़न) है। यह अध्ययन भारतीय उपभोक्ताओं के दिलो-दिमाग में गहराई से उतरकर, वित्तीय तैयारियों से जुड़े मिथकों को उजागर करता है और उन सामान्य भ्रमों को उजागर करता है, जो उनके समुचित वित्तीय सुरक्षा के रास्ते में बाधा पैदा करते हैं। एसबीआई लाइफ ने अपने नॉलेज पार्टनर-डेलॉयट के सहयोग से यह अध्ययन किया, जिसमें भारत के 41 शहरों के 5,000 उत्तरदाताओं को शामिल किया गया।
अप्रत्याशित चुनौतियों से बदली हुई दुनिया के बीच, अध्ययन एक कठोर वास्तविकता का खुलासा करता है कि वित्तीय तैयारियों के बारे में, भारतीय उपभोक्ताओं की धारणा, अक्सर भ्रामक होती है जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं और इस वजह से संभव है कि उन्हें या उनके परिवार के सदस्यों को जीवन की अनिश्चितताओं के बीच पर्याप्त वित्तीय सुरक्षा ना मिले। गौरतलब है कि 68% उपभोक्ताओं का मानना है कि उनके पास पर्याप्त बीमा है और दरअसल केवल 6% बीमित उपभोक्ताओं के पास पर्याप्त बीमा कवरेज है।
हालांकि, फिर भी उम्मीद की किरण है, क्योंकि तकरीबन 71% गैर-बीमाकृत उत्तरदाताओं का मानना है कि 'फिनांशियल इम्यूनिटी' प्राप्त करने के लिए बीमा बेहद ज़रूरी है। इसके अलावा, जिनके पास बीमा है उनमें से 83% लोग बीमा से मिलने वाली वित्तीय सुविधा के महत्त्व को स्वीकार करते हैं, जैसा कि एसबीआई लाइफ के फिनांशियल इम्यूनिटी अध्ययन 3.0 से पता चलता है।
वित्तीय प्रतिरक्षा की अवधारणा को जन-जन तक ले जाने के उद्देश्य से, एसबीआई लाइफ ने एक निःशुल्क 'फिनांशियल इम्यूनिटी कैलकुलेटर' भी लॉन्च किया है, जो उपभोक्ताओं की प्रोफाइल और वर्तमान वित्तीय परिसंपत्तियों के आधार पर उनकी ज़रूरत के मुताबिक फिनांशियल इम्यूनिटी स्कोर का आकलन करता है। यह स्कोर याद दिलाता है कि आज की तैयारी, कल की नींव को मज़बूत करती है। यह 'फिनांशियल इम्यूनिटी कैलकुलेटर' इस बारे में भी बहुमूल्य सुझाव प्रदान करता है कि व्यक्ति अपनी उक्त वित्तीय तैयारियों में के अंतराल को कैसे पाट सकते हैं।
अपने वित्तीय प्रतिरक्षा स्कोर की गणना करने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: फिनांशियल इम्यूनिटी कैलकुलेटर
फिनांशियल इम्यूनिटी स्टडी 3.0 के लॉन्च के मौके पर, एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी, श्री महेश कुमार शर्मा ने कहा, "एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस में, हमारा ध्यान, हमेशा लोगों की ज़रूरतों को सुरक्षित कर, उन्हें अपने प्रियजनों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए आज़ाद करने पर रहा है। डेलॉयट के सहयोग से आयोजित हमारी इस ताज़ातरीन पहल 'फिनांशियल इम्यूनिटी स्टडी 3.0' के साथ, हम भारतीय उपभोक्ताओं की वित्तीय तैयारियों से जुड़े उन भ्रम को दूर करने की पहल जारी रखे हुए हैं, जिनकी वजह से इसके बारे में हमें सही जानकारी नहीं मिल पाती। हमारा उद्देश्य है, लोगों को जानकारी, साधन और समाधान के साथ सशक्त बनाना है जो उनकी वित्तीय नींव को मज़बूत करेगा और अनिश्चितता भरी दुनिया में उन्हें सुकून प्रदान करेगा।
उन्होंने कहा, “इन निष्कर्षों से पता चलता है कि हमारी वित्तीय तैयारियों को समझने के तरीके में आमूल बदलाव की ज़रुरत है। यह बेहद चिंता का विषय है कि 80% उपभोक्ता वित्तीय सुरक्षा में बीमा की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करते हैं, फिर भी आश्चर्य है कि 94% के पास पर्याप्त बीमा सुरक्षा नहींहै। धारणा और वास्तविकता के बीच यह स्पष्ट विरोधाभास से हमारे मिशन की अनिवार्यता ज़ाहिर होती है। यह अध्ययन, महज़ एक रिपोर्ट से कहीं अधिक है; इस पर पहल करने की ज़रूरत है। हमारा मानना है कि हर व्यक्ति को जीवन की अनिश्चितताओं से मुकाबले के लिए तैयार होने का अवसर मिलना चाहिए। साथ मिलकर, हम धारणा और वास्तविकता के बीच के अंतर को पाट सकते हैं, और वास्तव में लोगों को 'फिनांशियल इम्यूनिटी' प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं।''
डेलॉयट इंडिया की कंसल्टिंग पार्टनर सौम्या द्विवेदी ने कहा, " इस 'फिनांशियल इम्युनिटी स्टडी (एफ.आई.) 3.0' पेश को करते हुए, हमें इस बात की खुशी है कि हमें एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस के सहयोग से इस महत्वपूर्ण उपभोक्ता अध्ययन में योगदान किया। निष्कर्षों से पता चलता है कि बड़ी संख्या में बीमा योग्य उपभोक्ताओं के पास या तो बीमा सुरक्षा नहीं है या फिर है तो वह पर्याप्त नहीं है, लेकिन वे फिनांशियल इम्यूनिटी के भ्रम में रह रहे हैं, जिससे वास्तविकता और आम धारणा के बीच पर्याप्त अंतर उजागर होता है। अध्ययन में उन प्रमुख मिथकों पर भी रोशनी डाली गई है, जो इस धारणा में मदद करते हैं और जागरूकता बढ़ाने तथा लक्षित संदेश प्रदान करने के महत्व को रेखांकित करते हैं, जो 2047 तक सामान बीमा सुरक्षा का स्तर प्राप्त करने के आईआरडीएआई के लक्ष्य के अनुरूप है और यह हमारे देशवासियों के दीर्घकालिक कल्याण को सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।"
उन्होंने कहा, “अध्ययन के निष्कर्ष मानसिकता में बदलाव की ज़रूरत पर बल देते हैं, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि जीवन और स्वास्थ्य सुरक्षा दोनों के साथ, उपभोक्ताओं को वित्तीय रूप से कैसे सशक्त बनाया जा सकता है। इससे यह रेखांकित होता है कि बीमा सिर्फ एक वित्तीय ज़रिया नहीं है, बल्कि हमारे देश के दूर-दराज़ इलाकों के लाखों लोगों के सपनों और आकांक्षाओं को पूरा करने का एक उल्लेखनीय साधन है। इस महान लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ज़रूरी है कि परितंत्र आपस में जुड़ें और भारत को एक ऐसा भविष्य बनाने में मदद करें, जहां हर भारतीय नागरिक के लिए फिनांशियल इम्युनिटी एक वास्तविकता हो।“
इसके अलावा, रिपोर्ट का मुख्य आकर्षण है, उपभोक्ताओं में व्याप्त पांच भ्रमों का खुलासा करना, जिनसे वित्तीय तैयारियां प्रभावित होती है; इन गलतफहमियों पर काबू पाकर, आर्थिक रूप से सुरक्षित भविष्य का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है:
भ्रम 1: "बीमा पॉलिसी होने भर से ही पर्याप्त सुरक्षा की गारंटी मिल जाती है"
• 68% उपभोक्ता इस भ्रम में जी रहे हैं कि उनके पास पर्याप्त बीमा सुरक्षा है, लेकिन सच तो यह है कि केवल 6% के पास ही अपनी वर्तमान बीमा पॉलिसियों के तहत पर्याप्त सुरक्षा है।
• वास्तव में, 94% उपभोक्ता के पास या तो बीमा नहीं हैं या फिर अपर्याप्त बीमा है
भ्रम 2: "वित्तीय साधनों (इंस्ट्रूमेंट) में निवेश, बीमा की तुलना में बेहतर सुरक्षा प्रदान करता है"
• वास्तव में, 80% उपभोक्ताओं का मानना है कि फिनांशियल इम्युनिटी के लिए बीमा बेहद ज़रूरी है और 71% गैर-बीमाकृत उपभोक्ताओं का मानना है कि फिनांशियल इम्युनिटी में बीमा की महत्वपूर्ण भूमिका है।
भ्रम 3: "धन की कमी की स्थिति में बीमा पॉलिसियाँ ज़ब्त की जा सकती हैं"
• लगभग 50% उपभोक्ताओं में समय से पहले अपनी पॉलिसी सरेंडर करने की प्रवृत्ति सामने आई
• लेकिन वास्तव में, बीमा पॉलिसियां ज़रूरत के समय ऋण के लिए कोलैटरल बन सकती हैं
भ्रम 4: "संपत्ति और बचत का स्वामित्व जीवन बीमा का प्रतिस्थापन है"
• वास्तव में, 62% उपभोक्ता भविष्य के लिए अपनी बचत को लेकर आश्वस्त नहीं हैं
• भारतीय परिवार, सावधि जमा और बचत जैसे पारंपरिक निवेश पसंद करते हैं, लेकिन उनसे बीमा पॉलिसियों के मुकाबले अलग किस्म का फायदा होता है
भ्रम 5: "नियोक्ता द्वारा दी जाने वाले बीमा सुरक्षा पर्याप्त है"
• 96% कर्मचारी जिन्हें अपने नियोक्ता (एम्पलॉयर) से बीमा सुरक्षा मिली है उनके पास ज़रुरत से कम बीमा है
• दरअसल, लोगों की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए संभव है कि नियोक्ता द्वारा प्रदान की गई बीमा पॉलिसी हमेशा पर्याप्त नहीं हो


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