मेजर ध्यान चन्द्र शुरुआती दौर में ब्रिटिश आर्मी की तरह से हॉकी खेला करते थे। उन्होने तकरीबन 4 साल की उम्र में रहकर ही हॉकी की प्रक्टिस की। उन्होने हॉकी खेलने के चलते ब्रिटिश आर्मी में कई प्रोमोशन भी मिले। उन्होने 1922 से लेकर 1926 तक ब्रिटिश आर्मी में ही हॉकी खेली।
ध्यानचनद्र के हॉकी कैरियर में सबसे बडा बदलाव तब आया जब उन्हे नेशनल टीम में न्यूजीलैंड दौरे के लिए शामिल किया गया। ये भारतीय हॉकी टीम का पहला विदेशी दौरा था। भारतीय हॉकी टीम पहली बार विदेश में हॉकी खेलने जाने वाली थी। ये 1926 का दौर था। मेजर ध्यान चन्द भी पहली बार देश से बाहर कही जा रहे थे।
भारत की हॉकी टीम ने न्यूजीलैंड में कमाल का प्रर्दशन किया। इस दौरे में कुल 18 मैच हुए। इन 18 मैचों में जिसमे से 15 मैचों में इंडिया को जीत मिली। न्यूजीलैंड की टीम केवल 1 मैच ही जीत पाई। बाकी के 2 मैच ड्रा रहे।
न्यूजीलैंड दौरे में जिस एक खिलाडी की सबसे ज्यादा चर्चा हुई। वो मेजर ध्यान चन्द्र ही थे। मेजर ध्यान चन्द ने इस दौरें में 100 से भी अधिक गोल किये। न्यूजीलैंड दौरे ने मेजर ध्यानचन्द्र को रातो रात स्टार बना दिया। जब ये टीम वापस इंडिया आई तो मेजर ध्यान चन्द्र को देखने के लिए लोगो का हुजूम उमड पडा। ध्यान चन्द के खेल से खुश होकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हे सेना में कई अवार्ड दिये। उनका प्रमोशन कर दिया दिया। वो लॉसनायक बना दिये गये।
अब मजर ध्यान चन्द्र और हाकी एक दूसरे के पर्यायवाची बन चुके थे। अब बारी थी ओलंपिक की। 1928 में एम्सटर्डम में ओलंपिक हुए। यही हॉकी में भारत के स्वर्णिम इतिहास की शुरूआत होती है। मेजर ध्यान चन्द्र की हॉकी अब जादू की छडी बन चुकी थी। जो जब भी चलती थी। उसमें से गोल निकला करते थे। 1928 में उसे इस ओलपिंक में भी ध्यान चन्द्र ने कमाल कर दिया। मेजर ध्यान चन्द्र के दम पर भारतीय हॉकी गोल्ड मेंडल जीतने में कामयाब हो गई।
इसके बाद हुए ओलंपिक में भारत ने लगातार गोल्ड मेडल जीते। 1928 से लेकर 1936 तक भारत लगातार मेजर ध्यानचन्द के सहारे ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतता रहा। उस वक्तदुनिया की कोई भी टीम हॉकी में इंडिया का मुकाबला नही कर पा रही थी। भारतीय की गूज दुनिया भर को सुनाई दे रही थी। कोई भी टीम उस दौर में भारत के खिलाफ खेलती थी तो उस टीम का हारना पक्का माना जाता था।
Source: Panchayat
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