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महादेव की इस जेल के कोतवाल स्वयं हैं शिव शंभु; कैदी करते हैं भजन-कीर्तन



आस्था और अंधविश्वास कई जगहों और लोगों में देखने को मिल जाता है, लेकिन क्या हो जब यह अंधविश्वास किसी जेल के कैदियों में बेहिसाब उमड़ा हो। जी हाँ, आज हम आपको ऐसी ही जेल के बारे में बताने जा रहे हैं। 

भोले की जेल कही जाने वाली यह जेल मध्यप्रदेश-राजस्थान की सीमा पर मध्यप्रदेश के नीमच शहर के पास स्थित है। यहाँ स्थित तिलसवां महादेव मंदिर के शिवलिंग को लोग स्वयंभू मानते हैं। यहाँ के लोगों का कहना है कि यह मंदिर लगभग दो हजार साल पुराना है। यहाँ शिवजी अपने पूरे परिवार के साथ विराजित हैं।   

इस अनूठी जेल को भोले की जेल कहा जाता है। यहाँ स्थित तिलसवां महादेव मंदिर के शिवलिंग को लोग स्वयंभू मानते हैं। यह मंदिर लगभग दो हजार साल पुराना है। यहाँ शिवजी अपने पूरे परिवार के साथ विराजित हैं। मंदिर के ठीक सामने गंगाकुंड बना हुआ है।

भजन करते हैं कैदी 

इस जेल की सलाखों के पीछे सौ से भी ज्यादा लोग कैद हैं। आपको जानकार हैरानी होगी कि ये कैदी बैरकों के भीतर ही भजन-कीर्तन करते हुए झूमते रहते हैं। कुछ कैदियों को तो कारावास भुगतते हुए सालभर से ऊपर हो गया है। कैदियों की रिहाई जेलर के आदेश के बाद ही होती है, और यह जेलर कोई सामान्य इंसान न होकर स्वयं प्रभु भोलेनाथ हैं।

ऐसी है मान्यता 

लोक मान्यता है कि यहीं से गंगा नदी का उद्‍गम हुआ था। ऐसी मान्यता है कि इस कुंड की मिट्टी असाध्य रोगों को ठीक कर सकती है, लेकिन इसके लिए यहाँ के नीति-नियम मानना होते हैं। भोले की जेल में कैदी बनकर रहना होता है। इसके पीछे लोगों का यह मानना है कि उनके पाप ही उनकी बीमारी का कारण हैं। इसलिए वे जेल में रहकर प्रायश्चित करते हैं। जब उनके पाप कट जाते हैं तब भोलेनाथ उन्हें स्वस्थ कर देते हैं।

स्वप्न में आते हैं भोलेनाथ 

अपनी बीमारियों से निजात पाने के लिए सबसे पहले रोगी मंदिर प्रशासन को एक आवेदन देता है। आवेदन स्वीकार किए जाने के बाद उन्हें कैदी नंबर दिया जाता है। साथ ही किस बैरक में रहना होगा, यह बताया जाता है। आवेदन स्वीकार करने के बाद कैदी के खाने-पीने का खर्च मंदिर प्रशासन ही वहन करता है। कैदी को यहाँ नियमित रूप से कुंड की मिट्टी से स्नान करना होता है, फिर सिर पर पत्थर रख मंदिर की पाँच परिक्रमा लगाना होती है।

मंदिर की साफ-सफाई का काम भी इन कैदियों के बीच ही बँटा होता है। इसी तरह दिन, महीने और साल बीत जाते हैं। कैदी को रिहाई तब ही दी जाती है, जब भोलेनाथ कैदी को स्वप्न में दर्शन देकर ठीक होने की बात कहते हैं। यही स्वप्न मंदिर प्रशासन को भी आता है। स्वप्न के बाद ही मंदिर प्रशासन कैदी को आजाद करने से संबंधित दस्तावेज बनाता है। तब जाकर कैदी को अपने पापों और जेल से रिहाई मिलती है। 




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