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50 साल के मंशी नाथ ने बताया कि लॉकडाउन लगने से पहले गांव वाले पानी दे देते थे लेकिन “लेकिन लॉकडाउन के इन दो महीनों में कुतों, बकरियों, गधों और हमने एक साथ सड़े हुए पानी से भरी होदी से पानी पिया है.”

 जयपुर में बस्सी, सांगनेर और बिलुवा फाटक के पास हजारों की संख्या में घुमंतुओं के डेरे हैं. पूरे लॉकडाउन में सरकर की ओर से यहां कोई राशन नहीं पहुंचा. पहले 30 दिन तो इन लोगों ने सुबह-शाम मंदिर से मिलने वाली खिंचड़ी खाकर बिताए. इन लोगों ने मुझे बताया कि सरकार के हेल्पलाइन 181 नंबर पर कॉल करने से कोई जवाब ही नहीं मिला. जब कभी उन लोगों ने नाम नोट भी कर लिए तो भी सप्लाई नहीं आई.



जैसलमेर की तपती रेत में 45-48 डिग्री तापमान पर घुमंतू लोगों को रोक कर रखा उन्होंने दो महीने कैसे जीवन जिया यह सोचने वाला सवाल हैं. ना पानी, ना पेड़ और ना कोई पक्का मकान. वे लोग सर्दी के मौसम में वहां जाते हैं क्योंकि इस दौरान वहां पर्यटक आते हैं. वे वहां से मार्च में लौटते हैं. बाड़मेर में सिणधरी तहसील में भाटों के वास में घुमंतू टोले तंबू डालकर रह रहे हैं. उनको राशन मिलना तो दूर, हालत यह है कि ये लोग पिछले एक महीने से होदी का गंदा पानी पी रहे हैं.

50 साल के मंशी नाथ ने बताया कि लॉकडाउन लगने से पहले गांव वाले पानी दे देते थे लेकिन “लेकिन लॉकडाउन के इन दो महीनों में कुतों, बकरियों, गधों और हमने एक साथ सड़े हुए पानी से भरी होदी से पानी पिया है.” उन्होंने मुझे बताया, “लॉकडाउन खुलने के बाद भी हमें कोई गांव में घुसने नहीं देता. पहले-पहले यहां एक सामाजिक संस्था ‘उड़ान’, जो कमजोर समुदायों के उत्थान के लिए काम करती है, ने हमे पानी दिया लेकिन पिछले एक महीने से हमारी स्थिति बहुत खराब हो गई है.”

यहां तकरीबन हर घुमंतू समुदाय की यही स्थिति है. मैंने एसडीएम सिणधरी से इस बारे में बात की. उन्होंने फोन पर कहा, “ये लोग गोचर भूमि पर बैठे हैं, हम इनको पानी नहीं दे सकते.” घुमंतुओं के पास अपनी भूमि नहीं है. इनके डेरे तो सदियों से इसी भूमि पर लगते आए हैं.

भारत के घुमंतुओं का जीवन ऐसा हादसा बन गया है कि जिसमें जीते जी ही नहीं बल्कि मरने के बाद भी सुकून नहीं हैं. किसी भी व्यक्ति के मरने पर उसके धर्म और मान्यताओं के अनुसार उसका अंतिम संस्कार किया जाता है, यह अधिकार है. उच्चतम न्यायालय का भी मानना है कि भले ही वह व्यक्ति अपराधी रहा हो लेकिन उसे भी अपनी अंतिम यात्रा उसकी मान्यताओं के अनुरूप करने का अधिकार है.

लेकिन यह बात घुमंतुओं पर लागू नहीं होती. इनके पास शमशान भूमि नहीं होती इसलिए ये लोग जहां होते हैं वहां की शमशान भूमि में अपने मृतकों को दफनाते हैं. लेकिन गांव वाले अक्सर इन्हें अंतिम संस्कार करने नहीं देते जिसके चलते ये लोग मृत देह को लेकर इधर से उधर घुमते रहते हैं कई बार तो तीन-चार दिनों तक लेकर घुमते रहते हैं. ऐसे मामले एक या दो नहीं हैं बल्कि पिछले दो सालों में ही ऐसे सैंकड़ों मामले मेरे सामने आए हैं जिनमें जिला प्रशासन ने मृत देहों का अंतिम संस्कार करवाया. 

यह स्थिति कालबेलियों, रंगा स्वामी और मुस्लिम कूचबंदा समुदाय के साथ ज्यादा त्रासदीपूर्ण हैं क्योंकि वे अपने मृतकों को दफनाते हैं. डूंगरपुर के 75 साल के जोरानाथ कालबेलिया का कहना है, “हम लोग जिंदा रहते हुए ही अपनी कब्र की व्यवस्था में लग जाते हैं. क्या करें कोई दफनाने नहीं देता. जब ऐसा होता है तो दूर गोचर भूमि, जहां कोई देखे ना, बिना कोई आवाज किए चुपचाप दफना देते हैं. यदि किसी को पता चल जाता है तो हमें कोई दफनाने नहीं देता. हम तो अपने लोगों को आंसू भी नहीं दे पाते. हमारे आंसुओं पर भी हमारा हक नहीं है.”

अभी कुछ दिनों पहले मैं शोध के सिलसिले में पाली जिला गया था. वहां मोग्या घुमंतू समुदाय की महिला मिश्रनी, जिसकी उम्र करीब 40-45 वर्ष थी, की मौत हो गई. उसके घर वाले उसके शव को नजदीक के शमशान लेकर गए, तो वहां के गांव वालों ने उस शमशान में उसका अंतिम संस्कार करने नहीं दिया. वे लोग दूसरे गांव ले गए और वहां भी मना कर दिया गया. उसके बाद वे उसे कंधे पर ही उठाए-उठाए तीसरे गांव ले गए और वहां भी मना कर दिया. अंत में वे उसे वापस अपने टोले में ले आए और अगले दिन उसके मृत शरीर को कलेक्टर दफ्तर में ले गए. जब प्रशासन उनकी मदद के लिए आगे आया तो गांव वाले नहीं माने और भारी विरोध का सामना करना पड़ा. शव को शाम को जंगल की भूमि में दफनाया गया किंतु वहां भी लोगों ने भारी विरोध किया. तीन दिन तक वहां पुलिस ने पहरा दिया. पूरे राजस्थान भर में सभी जातियों की अपनी शमशान भूमियां हैं किंतु घुमंतुओं के लिए कोई भूमि नहीं है.

राजस्थान के घुमंतू समुदाय वर्ष भर घुमते रहते हैं और साल के अंत में पुष्कर में एकत्र होते हैं. इसलिए पुष्कर का मेला इन समुदायों के मिलने का और अपना दुख-सुख साझा करने का एक अवसर था. यहीं से इनकी शादियां तय होती थीं, यहीं से इनकी सांस्कृतिक गतिविधियां तय होती थीं. पुष्कर मेला इस सामाजिक ज्ञान को अगली पीढ़ी को सीखाने और पीढ़ियों के सीखे हुए ज्ञान को सहेजने का एक अवसर था. घुमंतू अपने खास पशुओं को मेले के माध्यम से ही बेचते हैं. अर्थात यह मेला उनकी आर्थिक गतिविधियों का केंद्र भी है. 

राजस्थान सरकार ने पुष्कर मेला इवेंट कंपनी को दे दिया और मेले के सारे इवेंट वे ही रखे गए जो उसको इनाम दिला सकते थे. मेले से घुमंतू समुदायों के कार्यक्रमों को हटा दिया गया. वहां विदेशी लोगों के लिए सिर पर साफा बांधने और दौड़ के कार्यक्रम आयोजित हुए और कॉलेज की लड़कियों से घूमर नृत्य करवाकर गिनीज बुक में नाम दर्ज करवाया गया. 

मेले की परंपरा में ऊंटों पर नगाड़ा आता था. शाम को भोपा पाबूजी की फड़ बाचते थे. कालबेलिया लहरिया बजाते थे. इसी लहरिया से कालबेलिये लड़के-लड़कियां एक दूसरे को पसंद करते थे. यहां सभी अपनी जड़ी-बूटियां साझा करते थे. सभी समुदाय पशुओं का शृंगार करके लाते थे. उनकी प्रतियोगिता होती थी. पिछले वर्ष यह सब बंद कर दिया गया. ऊंट बिठाने वाली जगह को पक्का कर दिया गया और वहां हैलीपेड बना दिया गया. जंगल की बाड़बंदी कर दी गई. घुमंतू लोगों को मेला मैदान से बाहर कर दिया.

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