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चिराग पासवान को डैमेज तो बहाना है, नीतीश कुमार का असली निशाना कहां है?

लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) में टूट हो गई है। इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का मास्टर माइंड बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को माना जा रहा है। यह बात सामने आने पर पहला सवाल यही उठता है कि साफ-सुथरी पॉलिटिक्स में विश्वास रखने वाले नीतीश कुमार आखिर इस तरह के फैसलों की अगुवाई क्यों कर रहे हैं। आइए राजनीतिक संकेतों के जरिए समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर नीतीश कुमार (Nitish kumar) का असली निशाना कहां है?



पटना
लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के संस्थापक रामविलास पासवान के निधन को अभी एक साल भी नहीं हुए हैं, लेकिन उनकी पार्टी और परिवार दोनों बिखरते हुए दिख रहे हैं। पिता ने जाते-जाते बेटे चिराग पासवान के हाथों में पार्टी की कमान सौंपी थी, लेकिन युवा नेता ने अब तक जितने फैसले लिए हैं उसमें कहीं भी सकारात्मक सफलता नहीं मिली है। पार्टी के अंदर चिराग की कार्यशैली को लेकर नाराजगी इतनी है कि चाचा पशुपति पारस की अगुवाई में चचेरे भाई प्रिंस पासवान समेत पांच सांसदों ने अलग गुट बना लिया है। ये अभी साफ नहीं हो पाया है कि यह गुट चिराग पासवान को ही पार्टी से बाहर कर देंगे या किसी दूसरे दल में शामिल होंगे। इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का मास्टर माइंड बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को माना जा रहा है। यह बात सामने आने पर पहला सवाल यही उठता है कि साफ-सुथरी पॉलिटिक्स में विश्वास रखने वाले नीतीश कुमार आखिर इस तरह के फैसलों की अगुवाई क्यों कर रहे हैं। आइए राजनीतिक संकेतों के जरिए समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर नीतीश कुमार का असली निशाना कहां है?

Bihar Politics: चिराग तले अंधेरा! LJP में बड़ी टूट, चाचा पशुपति के नेतृत्व में 5 सांसदों ने की बगावत

विधानसभा चुनाव में डैमेज का बदला लेना चाहते थे नीतीश!
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में वोटिंग से ठीक कुछ दिन पहले चिराग पासवान ने एनडीए से अलग होकर अकेले मैदान में उतरने का फैसला किया था। चिराग ने बिहार चुनाव में उन सीटों पर मजबूत प्रत्याशी उतारे जहां से जेडीयू के कैंडिडेट थे, वहीं जिन सीटों पर बीजेपी के प्रत्याशी थे उनपर अपनी पार्टी का कैंडिडेट ही नहीं उतारा। माना जाता है कि इससे जेडीयू को भारी नुकसान उठाना पड़ा और मुख्यमंत्री नीतीश की पार्टी जेडीयू 43 सीटों पर सिमट गई। वहीं बीजेपी 74 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही। बीजेपी की केंद्रीय टीम की दखल से नीतीश कुमार को एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई, लेकिन नंबर गेम में पिछड़ने के चलते बीजेपी की राज्य ईकाई उनपर मनौवैज्ञानिक दबाव बनाए हुए है।

माना जा रहा है कि चिराग पासवान की ओर से किए गए इस डैमेज का बदला लेने के लिए नीतीश कुमार ने उनकी पार्टी को ही तहस-नहस करने पर आतुर हैं। पहले एलजेपी के एक मात्र विधायक को जेडीयू में शामिल कराया, अब पार्टी के छह सांसदों में से पांच को चिराग से अलग करने के पीछे भी इन्हीं का हाथ माना जा रहा है। रामविलास पासवान के छोटे भाई पशुपति पारस के नीतीश से अच्छे रिश्ते हैं। साथ ही पशुपति नहीं चाहते थे कि बिहार चुनाव में एलजेपी नीतीश का विरोध करे, लेकिन चिराग ने पार्टी अध्यक्ष के तौर पर इस सलाह को नकार दिया था, जिसका शायद उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।

चिराग के चलते जेडीयू को ना केवल सीटों का नुकसान हुआ, बल्कि बीजेपी के मुकाबले वोट शेयर भी काफी घट गया। बीजेपी को जहां 20.3 फीसदी वोट मिले, वहीं जेडीयू को 15.43 फीसदी वोट से संतोष करना पड़ा। राजनीति को जो भी समझते हैं वे भली-भाति जानते हैं कि चुनाव में सीटों का ऊपर नीचे होना उतना अहम नहीं है जितना कि वोट शेयर का घटना।

तीसरे नंबर की पार्टी बनने के बाद से कुनबा मजबूती में जुटे हैं नीतीश
बिहार विधानसभा चुनाव में तीसरे नंबर की पार्टी बनने के बाद से नीतीश कुमार लगातार अपने कुनबे को मजबूत करने में जुटे हैं। कुछ निर्दलीय विधायकों को वह पहले ही जेडीयू की सदस्यता दिला चुके हैं। इसके अलावा उपेंद्र कुशवाहा को पार्टी में लाए और अहम पद सौंपा है। अब एलजेपी को तोड़कर जनता दल युनाइटेड (जेडीयू) की ताकत लोकसभा में बढ़ाने में जुटे हैं। लोकसभा में बिहार से बीजेपी के 17 और जेडीयू के 16 सांसद हैं। अगर एलजेपी के पांच सांसद जेडीयू में आते हैं तो यह संख्या 21 हो जाएगी। यानी लोकसभा में जेडीयू बिहार की सबसे ताकतवर पार्टी हो जाएगी। नीतीश कुमार जिस तरह से जातीय समीकरण को साधकर अपना कुनबा मजबूत कर रहे हैं उससे तो यही लगता है कि आगामी चुनावों में वह बीजेपी के मुकाबले अपनी पार्टी का वोट शेयर बढ़ाने में जुटे हैं।

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