हिंदुस्तान के इतिहास में आज तक ऐसा नहीं हुआ है कि कोई योजना चल रही हो जिसकी ना कोई शुरुआत की तारीख हो और ना अंतिम दिन का पता हो. यह पहली ऐसी अनूठी योजना हैं. जिसमें कहीं कोई तारीख का जिक्र तक नहीं हैं. कब तक चलेगी? कब तक अप्लाई कर सकते हैं? यह प्रोत्साहन योजना कम और प्रतिस्पर्धा ज्यादा लग रही है. जो कलाकार नहीं जीत पाएगा वह योजना से बाहर हो जाएगा.
लॉकडाउन की मुश्किल घड़ी में राजस्थान सरकार घुमंतू लोक कलाकारों की मदद सीधे-सरल तरीकों से भी कर सकती है. मिसाल के लिए, इस काम में जवाहर कला केंद्र का बजट लगाया जा सकता है क्योंकि अभी एक वर्ष तक तो यहां कार्यक्रम होंगे नहीं, इसलिए इस पैसे को लोक कलाकारों में बांट दिया जाना चाहिए.
उधर मध्य प्रेदेश सरकार के कला एवं संस्कृति मंत्रालय ने भी इन समाजों के लिए कुछ नहीं किया और ना ही लोक कला को समर्पित विश्व प्रसिद्ध भारत भवन ने कुछ किया जबकि वे अपने इस साल के बजट को लोक कलाकारों को दे सकते थे क्योंकि लोक कलाकारों में 80 फीसदी लोग घुमंतू समुदायों से ही संबंधित लोग हैं.
भारत सरकार के अंतर्गत छह जोनल केंद्र हैं. जैसे पश्चिमी सांस्कृतिक केंद्र उदयपुर में है. ऐसे ही एक इलाहाबाद में हैं. इनका काम कला एवं संस्कृति को सहेजना, लोक कला को बचाना, उसे संरक्षित करना, आगे बढ़ाना और लोक कलाकारों के हितों का संरक्षण करना है. किंतु ऐसा करना तो दूर रहा, लॉकडाउन और उसके बाद किसी जोनल केंद्र ने ना कोई मदद का कार्यक्रम चलाया है और ना ही कोई हेल्पलाइन नंबर जारी किया.
इस तरह राजस्थान और मध्य प्रदेश के शिल्प एवं माटी कला बोर्डों ने इस संकट के समय माटी और शिल्प पर आश्रित समुदायों के लिए कुछ नहीं किया. मिट्टी का काम केवल कुम्हार ही नहीं करते बल्कि उनके अलावा भी ऐसे समुदाय हैं जो बिना चाक की मदद से मिट्टी का काम करते हैं. राजस्थान में ऐसे लोग मानसून से पहले और मानसून के बाद माटी का त्योहार मनाते हैं. ये समुदाय हैं : कुचबंदा, गिलारा, तुरी और अन्य.
यह समय सरकार के लिए बड़ी संभावना भी लेकर आया था. इस समय उस ज्ञान को सहेजने का उसके पास सुनहरा अवसर था क्योंकि सभी लोग अपने घरों में थे और सरकारें आसानी से उनकी कलाओं को एकत्र कर सकती थीं. इसी के जरिए इन लोगों को संबल देने का अवसर था. उन कलाकारों से तसल्ली से काम करवाया जा सकता था. यहां किसी तरह की हड़बड़ी या जल्दबाजी नहीं थी. इससे कलाओं को भी मरने से बचाया जा सकता था. यह एक अजीब विडंबना है कि जब कला मर रही होती है तब उस पर कोई बात नहीं करता लेकिन जब कला मर जाती है तो उसे बचाने के लिए बड़े टेंडर जारी होते हैं. जिसे “डाइंग आर्ट्स” को बचाना कहा जाता है. यह समय इन मृतप्राय कलाओं को जिंदा करने का था, उन्हें सहेजने का था लेकिन सरकारी संस्थाओं और सरकारों ने यह अवसर गंवा दिया.
राजस्थान सरकार ने अगले दो महीनों के लिए राशन सहायता हेतु एक पत्र जारी किया है जिसमें बाकायदा समाजों के नाम लिखकर कहा गया है कि अगले दो महीनों तक इन लोगों को पांच किलो अनाज और एक किलो चना मिलेगा. उसमें किसी घुमंतू समुदाय का नाम या घुमंतू शब्द का जिक्र तक नहीं था. मेरी रिपोर्ट छपने के बाद उस पत्र में घुमंतू शब्द जोड़ा गया किन्तु जरूरी कागजात के अभाव में अधिकांश घुमंतू लोगों को राशन नहीं मिल रहा. राजस्थान में ये समुदाय भुखमरी के कगार पर आ गए हैं. जोधपुर, जैसलमेर, जालौर, बारां, पाली, टोंक ओर अजमेर ऐसे तमाम जिलों से जो खबर आ रही हैं वे बहुत परेशान करने वाली हैं. लॉकडाउन के दौरान भी इन जिलों की हालत को मैंने व्यक्तिगत तौर पर जाकर देखा था. यहां केवल एक-दो उदाहरण बता रहा हूं.
जोधपुर के सुगनाराम भोपा की बस्ती, कालबेलियों की बस्ती और बंजारों की बस्ती से निरंतर सूचना मिल रही थी हालत गंभीर हैं. जब मैंने वहां जाकर देखा तो पाया कि चूल्हा जले दिन बीत जा रहे थे. मैंने जब बीडीओ, एसडीएम और डीएसओ को फोन किया तो फोन बंद थे. कलेक्टर ने फोन नहीं उठाया. कलेक्टर को व्हाट्सअप भेजा. कलेक्टर ने उसे पढ़ा लेकिन कोई रिप्लाई नहीं किया, कोई सहायता नहीं भेजी. आधिकारिक वेबसाइट पर बताए गए नंबर भी बंद थे. फिर संभाग कमिश्नर को फोन किया तो जाकर उनको राशन मिला.

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