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क्या यही है अम्बेडकर के सपनों का भारत ?

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देश में हर तरफ़ सिर्फ़ जातिवाद, धर्म और आरक्षण की आवाज़ सुनायी देती है। हर धर्म, जाति और वर्ग के लोगों ने अपने धर्म की एक सभा या महासभा बना रखी है । इन धर्म सभाओं में कोई उत्थान का कार्य नहीं होता जाती के नाम पर ये सभायें मात्र माध्यम है राजनीति में प्रवेश का। धर्म और जाति के नाम पर आरक्षण की आग पूरे देश में फैल गयी हैं ।क्या यहीं हैं अम्बेडकर के सपनों का भारत ?

26 नवंबर 1949 को बना और 26 जनवरी 1950 को लागू हुए संविधान को डॉ. अम्बेडकर ने पिछड़ी जातियों के हितों के लिए कुछ ऐसा गढ़ा, जिससे उन्हें समस्तरीय किया जा सके । वो ख़ुद अम्बेडकर ही थे, जिन्होंने कहा था कि अगर मुझे कभी भी यह महसूस हुआ कि संविधान का दुरूपयोग किया जा रहा है, तो सबसे पहले मैं ही इसे जलाऊँगा । उन्हीं भीमराव अंबेडकर के नाम पर आज जातिवाद को हवा देकर, देश को बांटा जा रहा है । ख़ुद को अंबेडकर की भक्त कहने वाली “भीम आर्मी” क्या वाकई उनके पदचिंहों पर चल रही है ?

समाज के हित के लिए क्या बस देश में आग ही लगायी जा सकती है ? आज जब देश में विशेष आरक्षण और सुविधाओं भी है, तब भी अपने अधिकार और समानता के नाम पर रोने वाले विभिन्न दल यह क्यों भूल जाते है की वह दौर कितना कठिन रहा होगा जब ना आरक्षण था ना शिक्षा का अधिकार । उस दौर में भी एक ब्राह्मण गुरु से शिक्षा पाकर भीमराव ने इतिहास रच दिया । ऐसी क्या वजह हो सकती है जो उन कठिन परिस्थितियों में जो अम्बेडकर कर सकते थे वह इस समय में इतनी सुविधाओं के बाद भी कोई नहीं कर पा रहा । और इसका कारण शायद राजनैतिक महत्वाकांक्षायें हीं है ।

वर्तमान में कोई भी व्यक्ति वास्तव में आवाज़, आंदोलन या झंडा किसी और के हित के लिए नहीं उठाता । वो सब राजनीति में प्रवेश, मीडिया का केंद्र और ख़ुद की पहचान जैसे स्वार्थ के लिए ही यह सब करते है। 14 अप्रेल 1891 में मध्यप्रदेश के महू में जन्में डॉ. भीमराव अंबेडकर स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा चाहते थे । संविधान के निर्माण के समय भी उन्होंने इस बात का ख़याल रखा और घोषणा के वक़्त भी कहा कि आने वाले समय में आवश्यकतानुरूप संशोधन भी किए जाने चाहिए ।

डॉक्टर अंबेडकर ने एक ऐसे देश की नींव रखी थी जहां “सर्वधर्म समभाव” हो । हलांकि हमारे देश में लोगों ने इस भावना का भी राजनीतिकरण कर दिया है ।अब आरक्षण देश के उन ज्वलंत मुद्दों में से एक है जो सत्ता सुख दे भी सकता है और छिन भी सकता है । अंबेडकर का कहना था बुद्धि का विकास ही मानव के अस्तित्व का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए । अंबेडकर हर ग़रीब व्यक्ति तक शिक्षा, स्वास्थ्य और मकान जैसी मूलभूत सुविधायें पहुँचाना चाहते थे । भारत में ख़ुद को डॉ. अंबेडकर का अनुयायी कहने वाली भीम आर्मी ख़ुद भी उनके पदचिंहों पर नहीं चल रही । अंबेडकर कभी भी हिंसा का समर्थन नहीं करते थे । वो कभी भी देश को बांटना नहीं चाहते थे । देश में उन्हीं अंबेडकर के नाम पर आरक्षण की राजनीति, जातिवाद की राजनीति की जा रही है। भीमसेना या भीम आर्मी भी अन्य जातियों के लिए अपने शब्दों से ज़हर उगलने में पीछे नहीं हटते ।

चंद्रशेखर रावण को आख़िर अंबेडकर की सेना बनानी ही क्यों पड़ी ? उन्होंने किसी दल या संगठन का निर्माण करने के बजाय सीधे “भीम आर्मी” ही बना डाली ये भले ही ख़ुद को अहिंसा का अनुयायी कह लें मगर इनके संगठन का नाम और “भीमा-कोरेगाँव” हिंसा को देश भुल नहीं सकता । ख़ुद को अंबेडकर का भक्त कहने वाले भूल गए भीमराव “सकपाल” थे उन्हें एक सवर्ण यानी ब्राह्मण शिक्षक महादेव अंबेडकर ने अपना नाम अंबेडकर दिया और साथ ही शिक्षा भी । अपने शिक्षक से यह प्रेम और प्रोत्साहन पाकर ही वे आगे बड़ सके। वो हर हिन्दुस्तानी के दिल में एक दूसरे के प्रति यही प्रेम और सम्मान देखना चाहते थे । यही वजह थी की संविधान निर्माण में उन्होंने अछूत माने जाने वाले वर्गों को विशेष अधिकार दिए । मगर आज उन्हीं अधिकारों का राजनीति के लिए प्रयोग किया जा रहा हैं । अब भी आवाज़ें उठती है मगर देश जोड़ने के लिए नहीं, बल्कि देश तोड़ने के लिए ।

उनके नाम का इस्तेमाल राजनीति के लिए होता है । आज कई जातियाँ अपने लिए आरक्षण की माँग को लेकर आंदोलन करती है । जाट, गुर्जर, जैन और पाटीदार कोई भी पीछे नहीं है । इन आंदोलनो और प्रदर्शन में देश की सम्पत्तियों को नुक़सान पहुँचाया जाता हैं । पटरियाँ उखाड़ी जाती हैं, बसों को जलाया जाता है । देश में भय पैदा किया जाता है । जिसने जितना आतंक मचाया, जिसने जितना सरकार को झुकाया वो उतना बड़ा नेता । आपनी राजनैतिक इच्छाओं को पूरा करने हेतु दल – धन, बल सबका जमकर इस्तेमाल किया जाता है । फिर एक रास्ता दिखाया जाता है आंदोलनकारियों को । इस राह पर चलकर सब कुछ मिलता है, नाम, पैसा और पॉवर । इसलिए आने वाले समय में भी यह आंदोलन, आरक्षण और जातिवाद की आग बुझेगी नहीं, बल्कि इसे और भी बढ़ाया जाएगा ।

डॉ. अंबेडकर के जन्मदिन को सभी नेताओं पार्टियों ने मनाया । उनके जन्मदिन जश्न ख़त्म हुआ । तो मेरा सभी से एक ही सवाल है क्या यहीं हैं अंबेडकर के सपनों का भारत ।

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