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मसूद अजहर की आजादी में सिर्फ चीन ही नहीं, पूर्व पीएम जवाहरलाल नेहरू और बीजेपी का भी हाथ है

National Politics Trandtropel

30 अगस्त 1950 – ‘तुमने लिखा है कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय, सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता वाली सीट पर से चीन को हटा कर भारत को उस पर बिठाने का प्रयास कर रहा है. जहां तक हमारा प्रश्न है, हम इसका अनुमोदन नहीं करेंगे. हमारी दृष्टि से यह एक बुरी बात होगी. चीन का साफ़-साफ़ अपमान होगा और चीन तथा हमारे बीच एक तरह का बिगाड़ भी होगा. मैं समझता हूं कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय इसे पसंद तो नहीं करेगा, किंतु इस रास्ते पर हम नहीं चलना चाहते. हम संयुक्त राष्ट्र में और सुरक्षा परिषद में चीन की सदस्यता पर बल देते रहेंगे. मेरा समझना है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के अगले अधिवेशन में इस विषय को लेकर एक संकट पैदा होने वाला है. जनवादी चीन की सरकार अपना एक पूर्ण प्रतिनिधिमंडल वहां भेजने जा रही है. यदि उसे वहां जाने नहीं दिया गया, तब समस्या खड़ी हो जायेगी. यह भी हो सकता है कि सोवियत संघ और कुछ दूसरे देश भी संयुक्त राष्ट्र को अंततः त्याग दें. यह (अमेरिकी) विदेश मंत्रालय को मनभावन भले ही लगे, लेकिन उस संयुक्त राष्ट्र का अंत बन जायेगा, जिसे हम जानते हैं. इसका एक अर्थ युद्ध की तरफ और अधिक लुढ़कना भी होगा.’ 

यह उस पत्र के अंश है जिसे भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपनी बहन विजयलक्ष्मी पंडित के उस पत्र के उत्तर में लिखा था जिसमें उन्होंने नेहरू को जानकारी देते हुए बताया था कि अमेरिका सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता वाली सीट पर से (ताइवान के राष्ट्रवादी) चीन को हटा कर उस पर भारत को बिठाने की बात कर रहा है. बता दें कि उस वक्त विजयलक्ष्मी पंडित अमेरिका में भारत की राजदूत थीं.  

“यह पत्र और 30 अगस्त 1950 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा दिया गया उसका उत्तर कुछ समय पूर्व नयी दिल्ली के ‘नेहरू स्मृति संग्रहालय एवं पुस्तकालय’ (एमएमएमएल) से प्राप्त हुए हैं.”  

ये बातें अभी क्यों हो रही हैं? 

दरअसल चीन ने एक बार फिर आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के मुखिया मसूद अज़हर को ‘वैश्विक आतंकवादी’ घोषित करने की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की कोशिश और भारत की मांगों को अंगूठा दिखा दिया है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस ने मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र की आतंकियों की  ब्लैक लिस्ट में शामिल करने का प्रस्ताव रखा था. लेकिन बुधवार को चीन ने इस प्रस्ताव को अपनी वीटो पावर का इस्तेमाल कर रोक दिया.   
 
बता दें कि इससे पहले, चीन तीन बार मसूद अज़हर को ‘वैश्विक आतंकी’ घोषित करने के प्रयासों पर ‘टेक्निकल होल्ड’ के जरिये रोक लगा चुका है. इस ‘टेक्निकल होल्ड’ के कारण 9 महीने के बाद ही इस प्रस्ताव को दुबारा पेश किया जा सकता है. इस प्रस्ताव पर रोक लगाते हुए चीन ने कहा कि वह मसूद अजहर पर प्रतिबन्ध लगाने के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए अभी और वक्त चाहता है.   

गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, संयुक्त राष्ट्र के छह प्रमुख अंगों में से एक अंग है जो कि अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए उत्तरदायी है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य हैं, जिनमें अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन जैसे विकसित देश शामिल हैं. भारत भी काफी समय से इसमें अपनी जगह बनाने के प्रयासों में लगा हुआ है.  

भारत खैरात में नहीं मांग रहा अपना हक़

जानकारों का मानना है कि भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपनी जगह खैरात में नहीं मांग रहा बल्कि यह उसका हक है. भारत संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य है. जनवरी 1942 में बने पहले संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने वाले 26 देशों में भारत भी शामिल था. 25 अप्रैल 1945 को सैन फ्रांसिस्को में शुरू हुए 50 देशों के संयुक्त राष्ट्र स्थापना सम्मेलन में भारत के भी प्रतिनिधि भी मौजूद थे. इस सारी प्रक्रिया के दौरान स्वतंत्रता के बाद भारत को भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता दिये जाने की बात जोरों पर चल रही थी लेकिन तब उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इन सारी संभावनाओं को एक झटके में ख़त्म कर दिया. क्योंकि उन्हें पूरा यकीन था कि ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ बनेंगे. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स तीखे शब्दों में इस बात का जिक्र भी करती है कि नेहरू ने काफ़ी समय तक चीन के प्रति अपनी निजी भावनाओं और अपने निजी आदर्शों को देशहित के भी ऊपर रखा. उनका कहना था कि चीन एक ‘महान देश’ है, इसलिए उसे उसका उचित स्थान जरूर मिलना चाहिए. 

बीजेपी द्वारा मसूद अज़हर को रिहा किए जाने की पूरी कहानी

दरअसल पुर्तगाली पासपोर्ट पर भारत में घुसे मसूर अजहर को गिरफ्तार कर लिया गया था लेकिन इसके 10 महीने बाद ही चरमपंथियों ने उसकी रिहाई के लिए हाथ पेअर मरण शुरू कर दिए और दिसंबर 1999 में चरमपंथी एक भारतीय विमान का अपहरण कर कंधार ले गए और इसके यात्रियों को छोड़ने के लिए मसूर समेत तीन आतंकियों को छोड़ने की मांग करने लगे जिसके लिए तत्कालीन बीजेपी सरकार राजी हो गई. उस वक्त भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल कधार में ही मौजूद थे. पूर्व रॉ चीफ अमरजीत सिंह दुलत बताते हैं कि सवाल ये था कि इन चरमपंथियों के साथ कंधार कौन कौन जाएगा. ऑफिसियल रिकॉर्ड में ये बात दर्ज थी कि उस समय इंटेलिजेंस ब्यूरो के अजित डोभाल कंधार में ही मौजूद थे. जब भारतीय विमान इन तीनों चरमपंतियों को दिल्ली से लेकर कंधार पंहुचा तो अजीत डोभाल अपहृत विमान के यात्रियों से मिलने विमान में गए थे. जहां अपहरणकर्ताओं ने उन्हें एक दूरबीन भी गिफ्ट किया था. इस बात का जिक्र भारत के पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने अपनी आत्मकथा ‘अ कॉल टु ऑनर – इन सर्विस ऑफ़ एमर्जिंग इंडिया’ में भी किया है.   
 
हालांकि कुछ जानकार ये भी बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने उस वक्त मसूद को कश्मीर का एक छोटा सा और भटका हुआ आतंकी बताकर हल्के में लिया था और अपहरण हुए यात्रियों को छुड़ाने के लिए ज्यादा प्रयास न कर उसे छोड़ने के लिए राजी हो गए थे. इस बात पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए जम्मू कश्मीर के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके फारुख अब्दुल्ला ने अपने एक बयान में कहा कि “जो हमें अब देशद्रोही बता रहे हैं, हमने उनकी सरकार (बीजेपी) से 1999 में कहा था कि मसूद अज़हर को रिहा न करें. हम तब उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ थे, आज भी हैं.”  

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