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राफेल डील में किसको मिलेगा कितना पैसा? एक बार में समझें पूरा गणित

National Politics

राफेल डील को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच घमासान जारी है. इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से केंद्र सरकार को क्लीन चिट दिए जाने के बाद भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, इस पूरी डील में सबसे बड़े घोटाले की बात कह रहे हैं. उनका आरोप है कि केंद्र की मोदी सरकार ने परोक्ष रूप से अनिल अंबानी की डिफेन्स कंपनी रिलायंस डिफेन्स को फायदा पहुंचाया है. वहीं विमानों की कीमत को लेकर भी बवाल छिड़ा हुआ है. कांग्रेस का आरोप है कि केंद्र सरकार ने 526 करोड़ के एक विमान को 1670 करोड़ में खरीदा है. जबकि मोदी सरकार का कहना है कि चूंकि सरकार ने बेसिक एयरक्राफ्ट की जगह हथियारों से लैस एयरक्राफ्ट खरीदने की डील की है, इस नाते उसकी कीमत ज्यादा है. हालांकि यहां सबसे अधिक गरमाया हुआ जो मुद्दा है वो ऑफसेट पार्टनर्स यानी रिलायंस डिफेन्स जैसी अन्य दूसरी कंपनियों को मिलने वाली रकम का है. तो चलिए समझते हैं कि आखिर क्या है ऑफसेट धनराशि का पूरा फंडा और कैसे होगा इस रकम का बटवारा..

सवाल नंबर एक- क्या है राफेल डील और ऑफसेट धनराशि का फंडा?

– ये एक गवर्नमेंट टू गवर्नमेंट डील है, मतलब इस डील का पैसा भारत सरकार फ्रांस सरकार को देगी.
– मोदी सरकार में खरीदे गए 36 राफेल जेट (हथियार+विशेष बदलाव के बाद) की लागत 59000 करोड़ रुपए बताई गई है.
– इस गवर्नमेंट टू गवर्नमेंट डील में हुए समझौते के मुताबिक फ़्रांस को सौदे का 50 फीसदी हिस्सा ऑफसेट के रूप में भारत में निवेश करना होगा.
– 50 प्रतिशत ऑफसेट मतलब हुआ लगभग 30000 करोड़ रुपए.

सवाल नंबर दो- किन पार्टनर्स को मिलेगा कितना पैसा?

– राफेल डील में मुख्य रूप से 4 कंपनियां है. जिनमें से 3 (थालेस, डासौ, सफ्रान) फ्रांस की है और 1 (डीआरडीओ) भारत की.
– इन चारों में 50% ऑफसेट धनराशि (30000 करोड़ रुपए) का बंटवारा इस प्रकार होगा!

1. THALES (फ्रांस) : 6300 करोड़ रुपए
2. DASSAULT (फ्रांस) : 8400 करोड़ रुपए
3. SAFRAN (फ्रांस) : 6300 करोड़ रुपए
4. DRDO (भारत) : 9000 करोड़ रुपए

सवाल नंबर तीन- क्या होगा इन चारों कंपनियों का किरदार?

दरअसल ये चारों कंपनियां राफेल के अलग अलग मुख्य पार्ट्स बनाएंगी.

थलेस: इलेक्ट्रॉनिक रडार और एयरक्राफ्ट में काउंटर मेजर्स बनाएगी.
डासौ: एयरफ्रेम और सिस्टम इंटीग्रेशन बनाएगी.
सफ्रान: M88 इंजन और लैंडिंग गीअर बनाएगी.
डीआरडीओ: डिजाइन किए गए स्वदेशी “कावेरी जेट इंजन” को पूर्वरूप में लाने के लिए विशेषज्ञता की दिशा में जाएगा.

सवाल नंबर चार: “कावेरी जेट इंजन” क्या है?

कावेरी को बैंगलोर में डीआरडीओ की गैस टर्बाइन रिसर्च इस्टेब्लिशमेंट (GTRE) द्वारा डिजाइन किया गया था. सफ्रान जो राफेल को शक्ति देने वाले M88 इंजन बनाता है, को उड़ान भरने योग्य बनाएगा जबकि डासौ इसे विमान में एकीकृत करेगा.

सबसे बड़ा सवाल- क्या है रिलायंस का राफेल में रोल?

भारत और फ्रांस सरकार के बीच हुई गवर्नमेंट टू गवर्नमेंट डील में फ्रांस की तीनों मुख्य कंपनियां (थलेस, डासौ, सफ्रान) राफेल जेट के अन्य पार्ट्स के लिए भारत में अपने सहयोगी पार्टनर्स चुनने को स्वतंत्र है. इसी के तहत इन तीनों मुख्य कंपनियों ने राफेल जेट के अन्य पुर्जे बनाने के लिए भारत में, भारत की कई कंपनियों को अपना पार्टनर बनाया है, “रिलायंस डिफेंस” के अलावा डासौ की लगभग 100 कंपनियों से बातचीत चल रही है जिसमें से उसने 30 कंपनियों को ऑफसेट पार्टनर के रूप में चुना है. ये सभी सहयोगी कंपनियां राफेल के विभिन्न छोटे, बड़े पार्ट्स बनाएंगी.

अन्य महत्वपूर्ण बातें

– डासौ के सीईओ “एरिक ट्रैपियर” ने साफ किया है कि रिलायंस के साथ डासौ का संयुक्त उद्यम (ज्वाइंट वेंचर) “DRAL” के “ऑफसेट ऑब्लिगेशन” में रिलायंस की सिर्फ 10% की ही हिस्सेदारी है.
– रिलायंस को कुल ऑफसेट धनराशि का 10% ही मिल रहा है. मतलब रिलायंस का जॉइंट वेंचर केवल डासौ के साथ ही है तो उसे केवल 8400 करोड़ रूपये के 10 परसेंट का, यानि 840 करोड़ रुपए का ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट मिला है.
– अन्य दोनों फ़्रांसिसी कंपनियां भारत की 100 से ज्यादा कंपनियों के साथ काम करेंगी जिनमें L&T ग्रासिम जैसी कंपनियां शामिल हैं.

ऊपर दी गई जानकारियां अपनी जगह पर बिलकुल सही हैं. लेकिन इस मुद्दे पर ताबड़तोड़ राजनीति के चक्कर में देश में एक भ्रम का माहौल पैदा हो गया है. डील पर सवाल उठाने वालीं चार याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर खारिज कर दिया कि वह रक्षा सौदे में दखल नहीं दे सकती, कोर्ट ने इसके लिए भारतीय संविधान की धारा 32 का हवाला देकर अपनी सीमाएं भी बताईं. दूसरी तरफ कांग्रेस इस मुद्दे को ठंडा नहीं होने देना चाहती. राहुल गांधी समझते है कि जैसे चौकीदार को चोर बताकर विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी अंधाधुंध प्रदर्शन करने में कामयाब रही वैसे ही राफेल उन्हें 2019 की सबसे बड़ी जंग जिताने में भी मदद करेगा. अब राफेल में बैठेकर केंद्र सरकार या कांग्रेस पार्टी क्या गुल खिलाना चाहते हैं, ये फैसला आपको ही करना है और सही गलत का निर्णय करने के लिए आपके पास महज कुछ महीनों का समय है बांकी हैं. अपने विवेक का इस्तेमाल करना शुरू कर दें.

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