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मध्यप्रदेश में बनेगी भाजपा की सरकार

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लगभग 24 घंटे से भी अधिक समय तक चली ऐतिहासिक मतगणना के बाद भी मध्‍यप्रदेश विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला है। इस कांटें की टक्‍कर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. वहीं सूबे में 15 साल राज करने वाली बीजेपी को दूसरे नंबर से संतोष करना पड़ा है. अब दोनों ही दलों ने कहा है कि वह सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे. मंगलवार 11 दिसंबर की सुबह 8 बजे से शुरू हुई मतगणना बुधवार 12 दिसंबर की सुबह 8.15 बजे तक चलती रही. चुनावी नतीजों में कांग्रेस पार्टी को 114, बीजेपी को 109, बीएसपी को 2, समाजवादी पार्टी को 1 सीट और 4 निर्दलीय उम्मीदवारों ने चुनाव जीते हैं. इसके बाद राज्य की दो सबसे बड़े राजनीतिक दलों बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने अपनी-अपनी सरकार बनाने का दावा पेश किया है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्य में सीएम पद के सबसे प्रबल दावेदार कमलनाथ ने कहा है कि कांग्रेस पार्टी ने रात को ही राज्यपाल आनंदी बेन पटेल को पत्र लिख उन्हें सरकार बनाने का मौका दिए जाने की सिफारिश की है, ताकि पार्टी विधानसभा में अपना बहुमत साबित कर सके. कमलनाथ का दावा है कि पार्टी को निर्दलीय विधायकों का समर्थन प्राप्त है. दूसरी तरफ बहुमत से 6 सीट पीछे रहने वाली भारतीय जनता पार्टी ने भी राज्यपाल से मिलने और अपनी सरकार बनाने का दावा पेश करने की बात कही है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंहमंगलवार देर रात को ट्वीट कर कहा, ‘प्रदेश में कांग्रेस को जनादेश नहीं है. कई निर्दलीय और अन्य बीजेपी के संपर्क में हैं. कल (बुधवार) राज्यपाल महोदया से मिलेंगे.’

तो कुल मिलाकर मामला अभी भी क्लियर नहीं है कि राज्य में कौन सी पार्टी अपनी सरकार बनाने जा रही है क्योंकि जिस प्रकार कांग्रेस बहुमत से मात्र दो सीट पीछे हैं और बीएसपी-सपा का कांग्रेस के साथ जाना भी लगभग तय मालूम पड़ता है. तो ऐसे में बहुमत साबित करने की अधिक उम्मीद कांग्रेस से की जा सकती है. हालांकि यहां बीजेपी का बहुमत के करीब रहने वाली बात से भी मुंह नहीं फेरा जा सकता. ऐसा इसलिए क्योंकि यहां खुद को चाणक्य नीति का अगुआ बताने वाले अमित शाह के शातिर दिमाग को झुठलाना, कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती है. कर्नाटक में बहुमत के करीब पहुंच चोट खाने वाली भाजपा एमपी में हर दाव सोच समझकर चलना चाहेगी. फिर भाजपा को राजनीति में चलने वाली खरीद फरोशत के काम को भी काफी सफाई से अंजाम देना होगा. ऐसे में यदि भाजपा अमित शाह के नेतृत्व में अन्य दलों और सत्तारूढ़ कांग्रेस के कुछ विधायकों को तोड़ लाने में सफल हो जाती है तो यहां ये कहना गलत नहीं होगा कि अभी भले ही मध्यप्रदेश की सत्ता पर कांग्रेस पार्टी अपना दावा पेश करे लेकिन अगले छह महीने में ही सूबे में बड़ा सत्ता परिवर्तन देखने को मिल सकता है.

मौजूदा हालातों को ध्यान दें तो बीजेपी, जिसके पास 109 सीटें हैं, अगर किसी तरह चारों निर्दलीय विधायकों को साथ लाने में कामयाब हो जाए तो उसे 113 तक पहुंचने में मदद मिल जाएगी. यहां मायावती के दो विधायकों के सपोर्ट को किनारे कर दें तो बीजेपी के पास सपा व कांग्रेस के विधायकों को तोड़ने का मौका रहेगा. ” हालांकि ये बात आपको कई न्यूज़ चैनल्स और सोशल मीडिया पर सुनने देखने को मिल जाएगी लेकिन ट्रूपल डॉट कॉम के राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो एमपी में राजनीति के दुसरे ही घोड़े दौड़ते नजर आ सकते हैं. यानी राज्य में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है और सत्ता पर कांग्रेस अपना दावा करने जा रही है. लेकिन कांग्रेस के पास राज्य में अपना सीएम उम्मीदवार घोषित करने के लिए दो चेहरे हैं. एक तो युवाओं के लोकप्रिय नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया है और दुसरे अनुभवी व वरिष्ठ नेता कमलनाथ. अब राज्य में इन दोनों में से किसी एक को ही मुख्यमंत्री का पद संभालना है. जाहिर सी बात है कि दोनों ही नेताओं की अपनी अलग अलग लोकप्रियता है, समर्थकों की अलग अलग लिस्ट है, तो दोनों के बीच मतभेद होने की संभावना भी प्रबल है. राहुल गांधी भले ही पार्टी में एकता की बात करते हो लेकिन ये बात तो साफ़ है कि यदि किसी एक को मुख्य कमान मिलती है तो किसी एक के समर्थकों का बिफरना निश्चित है. और भाजपा को इसी समय का इंतज़ार रहेगा. अमित शाह की चाणक्य बुद्धि अगर कांग्रेस के 10 फीसदी विधायकों को भी तोड़ लाने में कामयाब होती है तो 6 महीने के भीतर ही प्रदेश में बीजेपी की सत्ता में वापस आ सकती है. क्रिकेट भले अनिश्चितताओं का खेल हो लेकिन राजनीतिक खेलों में कोई भी आकलन गलत साबित हो सकता है.”

हालांकि भाजपा के लिए 116 के बहुमत तक पहुंच पाना इतना आसान नहीं होगा लेकिन कुछ महीनों का समय शाह नेतृत्व के लिए इस काम को आसन बना देगा. 2014 में सरकार बनने के बाद से हमने न जाने कितने ही विधायक मंत्रियों को कांग्रेस सपा बसपा छोड़ बीजेपी में शामिल होते देखा है, ऐसे में इस पेंचीदा समय में और अन्य विधायकों के टूटने या भाजपा की पाक साफ़ विचारधारा से जुड़ने की उम्मीद की जा सकती है.

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