Categories, unlike tags, can have a hierarchy. You might have a Jazz category, and under that have children categories for Bebop and Big Band. Totally optiona Categories, unlike tags, can have a hierarchy. You might have a Jazz category, and under that have children categories for Bebop and Big Band. Totally optiona Categories, unlike tags, can have a hierarchy. You might have a Jazz category, and under that have children categories for Bebop and Big Band. Totally optiona

बदहाली और पिछड़ेपन की मिसाल बन चुके बुंदेलखंड को कब मिलेगा घास की रोटी से छुटकारा

National Politics State Politics

रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास, मुगल शासक अकबर से लोहा लेने वाली रानी दुर्गावती, अंग्रेज़ों के नाक में दम करने वाली रानी लक्ष्मीबाई, राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त, हॉकी के जादूगर ध्यानचंद से लेकर भाजपा नेता उमा भारती और अभिनेता राजा बुंदेला तक न जाने कितनी ही ऐतिहासिक व जानी मानी शख़्सियतों ने बुंदेलखंड की धरती पर जन्म लिया. जिस बुंदेलखंड को इन महापुरुषों की धरती के नाम से पहचाना जाना चाहिए था आज उसे बदहाली और पिछड़ेपन की सबसे बड़ी मिसाल के तौर पर देखा जाता है. साल 2016 में आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता योगेंद्र यादव द्वारा किए गए एक सर्वे में इस बात का खुलासा हुआ था कि बुंदलेखंड में अधिकतर लोग घास की रोटियां खाकर जिंदा हैं. इस रिपोर्ट के बाद राजनीतिक गलियारों सहित पूरे देश में बवाल मच गया था.

“हालांकि बवाल बढ़ता देख कुछ वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले डॉक्टर भी सामने आए थे जिनका मानना था कि जिन गावों के लोग घास की रोटी खा रहे हैं, असल में वह वो घास नहीं हैं जो गाय बैल या अन्य कोई जानवर खाते हैं, बल्कि ये एक ऐसी घास है जो स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद होती है, बस परंपरागत अनाज के तौर पर इसकी अपनी पहचान नहीं बन पाई है. हालांकि जो ऐसा मानते हैं उनसे बस एक ही सवाल पुछा जा सकता है कि क्या लाख गुणों से परिपूर्ण होने के बाद भी आप उन घास की रोटियों को एक दिन के लिए भी अपने भोजन का हिस्सा बना सकते हैं? शायद नहीं…फिर बुंदेलखंड में तो लोग घास की रोटी ही खाकर जिन्दा हैं.”

बुंदेलखंड उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश दोनों ही राज्यों में आता है, जहां यूपी के सात और एमपी के छह ज़िले इसमें आते हैं. मध्यप्रदेश में टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दामोह, दतिया, और सागर ज़िले बुंदेलखंड के हिस्से ही है. यूपी हो या एमपी बुंदेलखंड के लगभग सभी इलाकों में सरकारों द्वारा किए जा रहे चौतरफा विकास के दावे जमीनी स्तर पर पूरी तरह खोखले ही नजर आते हैं. घास की रोटी के अलावा यहां के युवा गरीबी के कारण पढ़ाई बीच में ही छोड़ने पर मजबूर हैं. यहां के ज्यादातर इलाकों में लोगों के पास गरीबी की पहचान करने वाला बीपीएल कार्ड तक नहीं है. कुछ ग्रामीण बताते हैं कि कार्ड बनवाने जाओ तो रिश्वत की मांग की जाती है लेकिन जिसके पास जहर खाने के भी पैसे न हो वो रिश्वत की रकम कहां से लाए.

कभी कोई मीडियाकर्मी किसी एक गांव में भी पहुंच जाए तो दर्जनों की संख्या में लोग अपनी गरीबी और दयनीय स्थिति का दुखड़ा सुनाने चले आते हैं. लेकिन ऐसे हालात कुछ एक गावों तक ही सीमित नहीं है बल्कि बुंदेलखंड के ज्यादातर इलाके ऐसी ही स्थिति की मार झेल रहे हैं. मध्यप्रदेश के भीतर आने वाले बुंदेलखंड के इलाकों की बात की जाए तो यहां दिग्विजय सिंह के 10 साल के कार्यकाल में न कोई विकास कार्य को अंजाम दिया गया और न ही शिवराज सरकार ने 13 सालों में बुंदेलखंड के लिए किसी परियोजना को बल दिया. सूखे की मार झेलने वाले यहां के ज्यादातर इलाकों में न कोई सिंचाई परियोजना शुरू की गई, न ही कोई उद्योग आया और न ही कोई बिजली संयंत्र ही स्थापित किया गया. ये सब बातें तब कुछ ज्यादा खटकने लगती हैं जब बुंदेलखंड के पूरे इलाकों में कृषि प्रधान जिले होने के बावजूद यहां आज तक कोई एग्रोइंडस्ट्री नहीं लगाई गई. हालांकि बुंदेलखंड के लिए पिछले वर्षों में कुछ विशेष राहत पैकेज की बात सुनने को जरूर मिलती है लेकिन ये विशेष पैकेज कागजों से आगे कभी नहीं बढ़ पाते. साल 2009 में पिछड़ेपन की समस्या से जूझ रहे बुंदेलखंड के लोगों को राहत देते हुए तत्कालीन यूपीए 2 की सरकार ने इस क्षेत्र के लिए 7266 करोड़ रुपए के विशेष पैकेज को मंज़ूरी दी थी लेकिन विशेष पैकेज का सारा पैसा अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने हड़प कर लिया और योजनाएं सिर्फ़ क़ागज़ों पर ही धरी रह गईं.

दो रोज पहले मध्यप्रदेश की सत्ता में लगभग ढेर दशक के बाद कांग्रेस पार्टी ने वापसी की है. सूबे के मुख्यमंत्री पद पर बैठते ही कमलनाथ ने राज्य के किसानों को कर्ज मुक्त करने का तोहफा दिया है. साथ ही अन्य कुछ योजनाओं में भी पैकेज की बढ़ोतरी की है. लेकिन क्या इससे बुंदेलखंड के दिन बहुर जाएंगे? ट्रूपल टीम और बुंदेलखंड की जनता मध्यप्रदेश की नई सरकार से किसी विशेष पैकेज की उम्मीद नहीं कर रही क्योंकि कोई भी विशेष पैकेज यहां का विकास करने में तब तक सक्षम नहीं होगा जब तक यहां कोई स्थायी रोज़गार न दिए जाए और जब तक यहां के लिए कोई बुनियादी ढांचा न तैयार किया जाए. हमारे राज्य व केंद्र, दोनों ही सरकारों से अपील है कि जिस बुंदेलखंड में बेहतरीन क़िस्म का खनिज पाया जाता है, यहां जन जीवन सुधार की अपार संभावनाएं नजर आती हैं वहां के लोगों को घास की रोटी खाने पर मजबूर नहीं होना चाहिए. बस..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

*

Lost Password