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क्या अब मंदिरों में होगें बजरंगबली जायसवाल, महादेव श्रीवास्तव और मां काली कपूर के दर्शन!

National Politics

‘हम सबका संकल्प बजरंगी संकल्प होना चाहिए. बजरंगबली का संकल्प. बजरंगबली हमारी भारतीय परंपरा में एक ऐसे लोकदेवता हैं, जो स्वयं वनवासी हैं, गिरवासी हैं, दलित हैं, वंचित हैं, सबको लेकर के… सभी… पूरे भारतीय समुदाय को… उत्तर से लेके दक्षिण तक, पूरब से पश्चिम तक, सबको जोड़ने का कार्य बजरंगबली करते हैं. और इसलिए बजरंगबली का संकल्प होना चाहिए. राम काज किन्हें बिनु…’

उपरोक्त पंक्तियां उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ द्वारा 27 नवंबर को राजस्थान के अलवर में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए दिए गए एक भाषण से ली गई हैं. जिसकी अब राजनीतिक गलियारों से लेकर सड़कों तक, खूब किरकिरी हो रही है. हिन्दुओं के सर्वमान्य देवता हनुमान को योगी द्वारा दलित बताए जाने से नाराज ब्राह्मण सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुरेश मिश्रा ने कानूनी नोटिस भेज कर योगी आदित्यनाथ से अपने बयान पर माफी मांगने को कहा और तीन दिन में ऐसा न करने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है. वहीं राजद नेता तेजस्वी यादव ने योगी से कहा कि वे बीजेपी शासित सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की जाति बताएं. क्या इनमें कोई दलित है? अगर नहीं है तो इसका मतलब यह है कि भाजपा हनुमानजी का सम्मान नहीं करती. इसके अलावा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया कि “बीजेपी का अजेंडा है कि राम मंदिर विवाद चलता रहे, हजारों करोड़ की मूर्तियां बनवाओ, हनुमानजी को जातिवर्ग में शामिल करो, विज्ञान को पीछे करके किवदंतियों को आगे लाओ और जुमलों के सहारे जनता को सपने दिखाओ.” उधर खुद बीजेपी ने अपने सीएम योगी आदित्यनाथ के बयान से पल्ला झाड़ लिया है. पार्टी का कहना है कि योगी ने कांग्रेस को जवाब देने के लिए ऐसा कहा होगा. खैर ये तो हुई राजनेताओं द्वारा की गई बयानबाजी की बात, अब हनुमान जी को दलित बताए जाने का विश्लेषण भी कर लेते हैं.

दरअसल मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मतदान प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद सियासी दलों का जमघट राजस्थान में डेरा डाले हुआ है जहां आगामी 7 दिसंबर को विधानसभा चुनाव 2018 के लिए मतदान होने हैं. लिहाजा राजस्थान का सियासी माहौल अपने चरम पर है और बयानों के बाण बेरोकटोक धड़ल्ले से भेकें जा रहे हैं. लेकिन जहां अभी तक वोट बैंक की राजनीति में इंसानो को उनके धर्म-जाति के नाम पर बांटा जा रहा था, वहां अब भगवानों को भी नहीं बक्शा जा रहा है. हालांकि योगी आदित्यनाथ ने अपने भाषण में सिर्फ बजरंगबली को ही दलित, वंचित और गिरवासी की संज्ञा से नहीं नवाजा बल्कि उन्होंने लोगों से यह भी अपील की कि “जो राम भक्त हैं वो बीजेपी को वोट दें और जो रावण भक्त हैं वो कांग्रेस को वोट दें” अब उनके इन दोनों ही बयानों को बीजेपी के हिंदुत्व के एजेंडे और जातिगत वोट बैंक साधने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. देखा भी जाना चाहिए. क्योंकि राजस्थान में दलितों की संख्या कुल जनसंख्या का 17.89 फीसदी है.

राज्य के 12 जिलों में दलित मतदाता बड़ी संख्या में हैं। अनुमान है कि राजस्थान का दलित समुदाय बीजेपी से खफा है, क्योंकि हिन्दू एकता के नाम पर दलितों पर जो अत्याचार हो रहा है वो किसी से छिपा नहीं है. ऐसे में दलितों का वोट साधने के लिए योगी ने हनुमानजी को दलित बताने का नया फार्मूला इजात किया है. लेकिन योगी के ताजा बयान के कई अन्य सवालों को भी जन्म दे दिया है. जब देश का ज्यादातर आदिवासी समुदाय जो खुद को दलित तो नहीं मानता लेकिन बजरंगबली को अपना पूज्य देवता जरूर बताता है तो ऐसे में राजस्थान के 13.5 फीसदी आदिवासी वोटरों में योगी के इस बयान का क्या संदेश गया होगा, ये भी ध्यान दिए जाने वाली बात हैं. साथ ही योगी ने देशवासियों को भी एक प्रश्नचिन्ह में डाल दिया है कि आखिर बजरंगबली है कौन? जो बजरंगबली अभी तक हिन्दुओं के देवता हुआ करते थे उनकों लेकर अब प्रश्न उठ रहा है कि वो दलितों के देवता है? या ब्राह्मणों के या आदिवासियों के?

हालांकि इन सब सवालों से एक बड़ा सवाल यह है कि क्या सत्ता में बने रहने और कुछ वोटों के लिए हिन्दुओं के देवता दलित या आदिवासियों के देवता हैं कि नहीं, ऐसी बहसों को जन्म दिया जाएगा? और यदि देवताओं को भी जनरल/ एससी/ एसटी कैटेगरी में बांटा जाएगा तो क्या भविष्य में हम मंदिरों के भीतर बजरंगबली जायसवाल और महादेव श्रीवास्तव के दर्शन करने जाएंगे? मां दुर्गा यादव और काली कपूर के आशीर्वाद मिलेंगे! कुलमिला कर मोदी सरकार में गिरता जा रहा राजनीति का स्तर अब अपने चरम पर पहुंच गया है. जहां लोगों और देवताओं दोनों को धर्म जाति में बांटा जा रहा है. लेकिन वोटों के लिए खेले जाने वाले इस घटिया खेल को समझते हुए हमें इस बात पर ध्यान केंद्रित करना होगा कि देवी देवता किसी जाति विशेष के नहीं होते. वे सभी जाती धर्मों के लिए एक सामान होते हैं और जब बचपन से ही हमें यह बताया जाता है कि गीता कुरान जैसे सभी धार्मिक ग्रंथों में एक समान बातें लिखी हैं तो ये बीजेपी और योगी कौन होते हैं बटवारे का ज्ञान देने वाले. बहरहाल ये बहस का अलग मुद्दा है कि उस जमाने में जातियां थीं या नहीं, रामराज्य में भी दलित और शोषित थे या नहीं. वैदिक काल में जाति, धर्म और गोत्र होते थे या नहीं. लेकिन फिलहाल खुद को राम भक्त बताने वाले बीजेपी नेता राजनीतिक फायदे के लिए कट्टर रामभक्त को भी राजनीति में घसीट लाए है जो असल में भाजपा का एक बेहद ही घटिया और निंदनीय चेहरा है.

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