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दुनिया की सबसे बड़ी पॉलिटिकल पार्टी का वजूद ख़त्म करने की राह पर पीएम मोदी!

National Politics

कहते है कि जब प्रजातंत्र में किसी सरकार को अपनी पिछली सरकारों को कोसने और खुद की प्रशंसा करने का रोग लग जाए तो मान लेना चाहिए कि उसके पास उपलब्धियां गिनाने के लिए कुछ भी नहीं हैं. ऐसा कैसे? वो इसलिए क्योंकि जन कल्याण के लिए किये गए कार्य किसी प्रचार-प्रसार के मोहताज नहीं होते. जनता स्वयं ही उनका प्रचार करती है. लेकिन वर्तमान में देश की मोदी सरकार शायद विपक्षी दलों की बुराई करने और खुद की प्रशंसा करने के रोग से ग्रसित हो गई है. और शायद यही कारण है कि मोदी सरकार पर खुद की वाहवाही करने का कुछ ऐसा भूत सवार है कि वह इतिहास के साथ तो तोड़मड़ोड़ कर ही रही है साथ ही देश की जनता को धर्म और जाती के नाम पर मुख्य मुद्दों से भटकाने में जुटी हुई है. जैसा हम जानते और समझते हैं कि किसी भी लोकतंत्र में विपक्ष का एक अहम किरदार होता है. विपक्ष सत्तारूढ़ पार्टी के कामों पर प्रश्न खड़ा करता है, सरकार अपनी खामियों को दूर करने की दिशा में काम करती है और इसी प्रकार एक मजबूत लोकतंत्र की नींव रखी जाती है. लेकिन शायद मोदी सरकार की डिक्शनरी में इस कांसेप्ट का जिक्र नहीं है. इसका ताजा उदाहरण राजस्थान विधानसभा चुनाव के प्रचार अभियान में देखने को मिला, जहां अलवर में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने अपने पौने घंटे से भी अधिक के भाषण में न तो मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया जैसे रोजगार और विकास सृजन मुद्दों की बात की और ना ही राफेल, महिला सुरक्षा और स्वास्थ्य या शिक्षा जैसे ही मुद्दों पर कोई टिपण्णी की.

अपने 48 मिनट के भाषण में पीएम मोदी सिर्फ कांग्रेस की 60 साल की नाकामियां और अपनी चार साढ़े चार साल की बेनामी उपलब्धियां गिनाते नजर आए. दरअसल यह पहला मौका नहीं है जब पीएम मोदी विपक्ष खासतौर पर कांग्रेस पर हमला बोलते दिखे. साल 2014 में सरकार बनने के बाद से ही लगभग हर मौके पर पीएम मोदी यही करते आए हैं. शायद वह ये चीज भूल चुके है कि जनता ने उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर कांग्रेस का इतिहास खंगालने के लिए नहीं बल्कि देश के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए बैठाला है, लेकिन क्या वजह है कि पीएम मोदी सरकार बनने से पहले और बीच में अपने द्वारा किये सारे वादों को किनारे रख, बस कांग्रेस और राहुल गांधी का राग अलापते रहते हैं. फिर कहने वाले यह भी कहते हैं कि मोदी सरकार के पास अपने लिए कुछ अच्छा बताने को हैं ही नहीं इसलिए वह सिर्फ कांग्रेस का बुरा-बुरा बताने में जुटे हुए है ताकि उनकी सरकार से नोटबंदी, जीएसटी, तीन तलाक, राफेल, रोजगार, कालाधन, किसान और गरीबी जैसे ज्वलनशील मुद्दों पर सवाल ही न पूछे जाये और यूं ही मुद्दों से भटका कर वोट बैंक की राजनीती को चालू रख जाए.

कुछ राजनीतिक विशेषज्ञ तो यह भी कहने से नहीं कतराते कि बीते चार सालों की उपलब्धियों के रूप में यदि मोदी सरकार के पास कुछ भी दिखाने को है, तो वो हैं मोदी जी की खर्चीली रैलियाँ, गढ़े हुए और अभिनय से भरे भाषण और कांग्रेस नीत यूपीए सरकार की परियोजनाएं, फिर चाहे वो जम्मू-कश्मीर की ‘चेनानी-नाशरी’ देश की सबसे बड़ी सुरंग हो या असम का ‘ढोला-सादिया’, देश के सबसे लंबे पुल का उद्घाटन. बस. मेरे ख़याल में भारतीय जनता पार्टी और पीएम मोदी को अब इस विचारधारा से बाहर आने की जरुरत है कि उनकी सरकार आने से पहले देश राम भरोसे चल रहा था और बीजेपी के सत्ता में आते ही देश बुलंदियों की नई ऊचाइयों को छू रहा है. पीएम मोदी को शायद अब देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर राहुल गाँधी तक, गाँधी परिवार को कोसने की प्रवत्ति को बदल लेना चाहिए. जहां अभी तक देश का लगभग हर तबका उनकी बातों से प्रभावित हो उनकी तरफ उम्मीद की नजर से देख रहा था, अब वहीं लोग उन्हें जुमलेबाजों की सरकार के रूप में देखने लगे है. पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी बाजपेयी का एक भाषण याद आता हैं जिसमे वह संसद भवन में खड़े हो यह कहते दिखते हैं कि ” मैं ये नहीं कहता कि पिछली सरकारों ने कोई काम नहीं किया, भारत ने पिछले 50 सालों में जो भी तरक्की की है वो पिछली सरकार की ही देन हैं” लेकिन क्या कारण हैं कि पीएम मोदी को आज तक कांग्रेस में सिर्फ बुराइयां ही नजर आई और उसका एक भी अच्छा काम उन्हें नहीं दिखा, जबकि मनमोहन सरकार की योजनाओं पर अपना टैग लगा छाती पीट रहे हैं. हालांकि पीएम मोदी को यह बताने और समझाने वाला मैं कोई विशेष व्यक्ति नहीं हूं. लेकिन पीएम मोदी की तरह ही एकतरफा मन की बात करने का हक़ मुझे संविधान से जरूर मिला हुआ हैं. इसलिए अंत में महात्मा गाँधी की एक बात याद करते हुए बस इतना ही कि “किसी सरकार के कामों की समीक्षा करनी हो तो उस सरकार में किसानों और गाँवों की दशा जान लीजिए. देश का हाल पता लग जायेगा.”

अतुल मलिकराम
ट्रूपल डॉट कॉम को-फाउंडर

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